बाबा मटेश्वर धाम श्रावणी मेला की 21साल
संघर्ष से शिखर तक:
आज लाखों कांवरियों की आस्था का केंद्र है बाबा मटेश्वर धाम, लेकिन इसकी शुरुआत कुछ युवाओं के छोटे से संकल्प से हुई थी
बोलता है बिहार, सहरसा
आज बाबा मटेश्वर धाम में श्रावण मास की प्रत्येक सोमवारी पर लाखों डाकबम और कांवरिया श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। पूरे कोसी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना चुका यह श्रावणी मेला आज 21वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। लेकिन इस भव्य आयोजन की नींव किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि गांव के कुछ युवाओं की आस्था, संघर्ष, त्याग और जनसहयोग से रखी गई थी। यह कहानी केवल एक मेले की नहीं, बल्कि संकल्प से सिद्धि तक की प्रेरक गाथा है।
जब जंगलों के बीच था 'बुढ़वा मंठ'
करीब तीन दशक पहले कांठो गांव स्थित यह प्राचीन शिवालय चारों ओर घने जंगलों से घिरा हुआ था। स्थानीय लोग इसे "बुढ़वा मंठ" के नाम से जानते थे। मंदिर तक पहुंचने के लिए कोई समुचित सड़क नहीं थी और यहां आने-जाने का रास्ता भी बेहद कठिन था। ऐसे समय में यहां किसी बड़े धार्मिक आयोजन की कल्पना भी मुश्किल थी।
एक विचार जिसने बदल दिया इतिहास
वर्ष 1997 में जब क्षेत्र के श्रद्धालु सावन में बाबा वैद्यनाथ धाम, देवघर जाने की तैयारी कर रहे थे, तभी कांठो निवासी मुन्ना भगत के मन में एक विचार आया—"जब भगवान शिव स्वयं हमारे गांव में विराजमान हैं, तो देवघर की तर्ज पर यहीं जलाभिषेक की परंपरा क्यों नहीं शुरू हो सकती?"
इस संकल्प को साकार करने के लिए उन्होंने शिवेंद्र पौद्दार, सिकेंद्र साह, विनोद साह सहित कई युवाओं को साथ जोड़ा। इसके बाद 31 अगस्त 1997 (भाद्र मास के द्वितीय रविवार) को पहली बार मुंगेर के राजघाट छर्रापट्टी से गंगाजल भरकर रेलवे की छोटी लाइन के दुर्गम मार्ग से पैदल यात्रा करते हुए बाबा मटेश्वर धाम पहुंचकर जलाभिषेक किया गया। यही ऐतिहासिक यात्रा आगे चलकर श्रावणी मेले की आधारशिला बनी।
आठ वर्षों तक संघर्ष, फिर मिली सफलता
मुन्ना भगत और शिवेंद्र पौद्दार बताते हैं कि 1997 से 2005 तक लगातार प्रयासों के बावजूद श्रद्धालुओं की संख्या दो अंकों से आगे नहीं बढ़ सकी। कई बार निराशा हाथ लगी, लेकिन अभियान नहीं रुका।
इसी दौरान वर्ष 2005 में मंदिर परिसर में घटी एक दैविक घटना के बाद यह महसूस हुआ कि केवल डाकबम यात्रा से व्यापक पहचान संभव नहीं होगी। तब 1 अगस्त 2005 की सावन की दूसरी सोमवारी से कांवर यात्रा की शुरुआत की गई और इसी के साथ बाबा मटेश्वर धाम के श्रावणी मेले का औपचारिक शुभारंभ हुआ।
दुकानदार नहीं आए तो आयोजकों ने उठाया नुकसान
मेले के शुरुआती वर्षों में दुकानदार और झूला संचालक यहां दुकान लगाने को तैयार नहीं थे। आयोजकों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि यदि नुकसान हुआ तो उसकी भरपाई की जाएगी। पहले वर्ष अपेक्षित भीड़ नहीं पहुंची और व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद मुन्ना भगत एवं उनके साथियों ने गांव-गांव से चंदा जुटाकर स्वयं सभी दुकानदारों की क्षतिपूर्ति की। इस विश्वास ने अगले वर्षों में मेले को नई गति दी।
गांव-गांव पहुंचा प्रचार, बढ़ती गई आस्था
दूसरे वर्ष से आयोजन की तैयारी कई महीने पहले शुरू होने लगी। आसपास के गांवों में युवाओं की टीमें बनाई गईं। घर-घर जाकर बाबा मटेश्वर धाम की महिमा और श्रावणी मेले का प्रचार किया गया। इसका असर यह हुआ कि हर वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती चली गई और डाकबम व कांवरियों का कारवां लगातार विस्तृत होता गया।
एक-एक रुपये के चंदे से चलती थी व्यवस्था
शुरुआती दौर में मंदिर की कोई स्थायी आय नहीं थी। पूरे मेले का संचालन ग्रामीणों से एक-एक रुपये का चंदा जुटाकर किया जाता था। जनसहयोग ही इस आयोजन की सबसे बड़ी ताकत बना।
सड़क बनी तो बदल गई तस्वीर
बढ़ती लोकप्रियता के बीच तत्कालीन विधायक दिनेश चंद्र यादव के प्रयास से बाबा मटेश्वर धाम तक मुख्य सड़क का निर्माण कराया गया। बेहतर सड़क बनने के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और बाबा मटेश्वर धाम पूरे कोसी क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हो गया।
शंकराचार्य के आगमन से मिली नई पहचान
अप्रैल 2003 में बाबा मटेश्वर धाम में आयोजित संत महासम्मेलन में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती पहुंचे। शिवलिंग के दर्शन के बाद उन्होंने कहा
"ऐसा अद्भुत शिवलिंग मैंने पहली बार देखा है। इसके दर्शन कर मेरा जीवन धन्य हो गया।"
शंकराचार्य के इस वक्तव्य ने बाबा मटेश्वर धाम की धार्मिक प्रतिष्ठा को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
न्यास बोर्ड में पंजीकरण से विकास को मिली रफ्तार
वर्ष 2010 तक मंदिर को शासन-प्रशासन का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाया था। बाद में मुन्ना भगत के प्रयास से बाबा मटेश्वर धाम का पंजीकरण बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड, पटना में कराया गया और न्यास समिति का गठन हुआ। इसके बाद मंदिर के विकास, आधारभूत सुविधाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं में तेजी आई।
आज लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र
आज बाबा मटेश्वर धाम केवल सहरसा जिले का ही नहीं, बल्कि पूरे कोसी क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। श्रावण मास की प्रत्येक सोमवारी पर लाखों श्रद्धालु यहां जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। इतनी बड़ी भीड़ के बीच सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण और विधि-व्यवस्था बनाए रखना जिला प्रशासन, अनुमंडल प्रशासन, बाबा मटेश्वर धाम न्यास समिति और डाक कांवरिया संघ के लिए बड़ी जिम्मेदारी होती है।
राजकीय मेले का दर्जा देने की मांग
श्रावणी मेले की 21वीं वर्षगांठ पर संस्थापक सदस्य मुन्ना भगत ने राज्य सरकार से मांग की है कि बाबा मटेश्वर धाम के ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व तथा यहां प्रतिवर्ष उमड़ने वाली विशाल श्रद्धालु संख्या को देखते हुए श्रावणी मेले को राजकीय मेले का दर्जा दिया जाए। उनका कहना है कि इससे इस ऐतिहासिक धाम का समुचित विकास होगा, धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और कोसी क्षेत्र की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत होगी।





















